कोलकाता. कोलकाता की दुर्गा पूजा दुनियाभर में प्रसिद्ध है। अमूमन यहां पूजा की तैयारियां 6-7 महीने पहले शुरू हो जाती है। सरस्वती पूजा के बाद से ही यहां तैयारियां शुरू हो जाती हैं। लेकिन, इस बार चौतरफा सन्नाटा पसरा है। पूजा समितियों के लोग बस एक ही बात कहते हैं, अक्टूबर में पूजा तो होगी लेकिन स्वरूप क्या और कैसा होगा हम बता नहीं सकते। बस इतना ही कह सकते हैं कि पहले जैसी भव्यता इस बार नहीं होगी। कारण कोरोना है। शहर में छोटी-बड़ी 400 से अधिक पूजा समितियां हैं। कई तो 85 साल से ज्यादा पुरानी हैं। सबका अपना इतिहास है। जतिन दास पार्क, हाजरा क्रॉसिंग की 75 साल पुरानी दुर्गा पूजा की शुरुआत नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कोलकाता म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के दलितों के लिए की थी। तब उन्हें पूजा में शरीक नहीं होने दिया जाता था। यहां आज भी पूजा होती है। लेकिन, इस बार कोरोना के कारण आकार छोटा होगा। कारोबारी कहते हैं कि हमें दीवार पर लिखी इबारत अभी से दिख रही है। पूजा का रूप क्या होगा, अभी तय नहीं है, क्योंकि 150 पूजा समितियों के संगठन वेस्ट बंगाल दुर्गा पूजा फोरम ने राज्य सरकार को आयोजन के स्वरूप तय करने को लेकर पत्र लिखा है। ताकि समय रहते जरूरी एहतियात बरत लिए जाए। लेकिन, अभी सरकार का जवाब नहीं आया है। मूर्ति निर्माण के लिए प्रसिद्ध कोलाकाता की कुम्हार टोली में शिल्पकारों के संगठन ‘कुम्हारटोली मृत शिल्प संस्कृति समिति’, के बाहर टंगे फ्लेक्स पर ‘लाल’ अक्षरों में लिखा है ’फॉरेनर्स नॉट अलाउड’।’फॉरेनर्स’ की बात इसलिए कि दूसरे देशों में भी यहां के कारीगरों की पारंपरिक ढंग से बनाई मूर्तियों की मांग है और हर साल बड़े पैमाने पर विदेशी यहां मूर्तियों का आर्डर देने आते हैं। जय दुर्गा भंडार के कौशिक घोष बताते हैं कि फरवरी-मार्च से ही फॉरेन से आर्डर बुक होने लगते थे। उसी समय हमें दो आर्डर मिले, उसके बाद एक भी नहीं। घोष, फाइबर से बनी मूर्तियां विदेश भेजते हैं। अभी कुछ दिन पहले ही उन्होंने 1 मूर्ति ऑस्ट्रेलिया और दूसरी कनाडा भेजी है। कीमत 2 से 2.5 लाख रुपए मिली। उन्होंने ऐसी ही सात मूर्तियां इस उम्मीद में तैयार कर रखीं हैं कि शायद सिंगापुर या दुबई से आने वाले दिनों में कोई ऑनलाइन या टेलीफोन पर आर्डर आ जाए। 2019 में घोष ने 35 मूर्तियां विदेश भेजीं थीं। कहते हैं, इस बार 10 तक भी संख्या नहीं पहुंचेगी। कमाई की बात तो छोड़िए, लेबर खर्च भी निकलना मुश्किल होगा।

यहां कुम्हारटोली मृत शिल्प संस्कृति समिति’, के बाहर टंगे फ्लेक्स पर ‘लाल’ अक्षरों में लिखा है- फॉरेनर्स नॉट अलाउड’।’ बड़ी संख्या में यहां से विदेशों में मूर्तियां जाती हैं। फोटो- संदीप नाग
कुम्हारटोली की फाइबर की मूर्तियों की भले विदेशों में मांग हो लेकिन असली पहचान मिट्‌टी के काम की है। यहां 200 से ज्यादा मूर्तिकार और उनसे जुड़े 900 से अधिक कारीगर साल भर मिट्‌टी की मूर्ति गढ़ते हैं। इनकी साल भर की जीविका दुर्गा पूजा से ही जुटती है। कुम्हारटोली के कारीगरों के ठप कारखाने बयां कर रहे हैं कि इस बार कोलकाता की दुर्गा पूजा फीकी-फीकी सी होगी। आम तौर पर मार्च-अप्रैल में कुम्हारटोली के कारीगरों को मूर्तियां बनाने का आर्डर मिल जाता था, सभी किसी न किसी समिति से दशकों से जुड़े हैं। 200 मूर्तियां बनाने वालों के पास मुश्किल से 10-20 आर्डर हैं, वह भी छोटे आकार की मूर्तियों के। शिल्पी कार्तिक पाल बताते हैं कि हमारे पास काम नहीं है। करारा झटका लगा है। जिस मूर्ति की कीमत 1.5 लाख है, उसे लोग आधे दाम में खरीदना चाहते हैं। लागत निकलना भी मुश्किल है। ऊपर से परेशानी यह है कि प्रतिमा बनाने के लिए गंगा की जिस मिट्‌टी का प्रयोग होता है, वह महंगी हो गई है। बांस, पुआल और दूसरी जरूरी चीजों की भी कीमत बढ़ गई है। हमने अन्नपूर्णा की 100 मूर्तियां बनाई थी। एक भी नहीं बिकी। अन्नपूर्णा पूजा 1 अप्रैल को थी। लॉकडाउन में पूंजी फंस गई।

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कॉन्फेडरेशन ऑफ वेस्ट बंगाल ट्रेड एसोसिएशंस के अध्यक्ष सुशील पोद्दार कहते हैं, बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान लगभग 3000 करोड़ रुपए का कारोबार होता था। इनमें पूजा पंडाल के निर्माण से लेकर बाजार में खरीदारी शामिल हैं, लेकिन कोरोना के कारण सुस्त अर्थव्यवस्था और बाजार की स्थिति को देखते हुए यह कारोबार 20 से 25 फीसदी तक सिमट जाने की संभावना है। आज लोगों के पास खर्च करने के पैसे नहीं हैं। सोशल डिस्टेसिंग का पालन करना है। ऐसी स्थिति में बहुत कम ही उम्मीद है कि पहले की तरह भ‍व्यता इस साल पूजा की पूजा में दिखे। यदि पूजा के आयोजन पूर्व की तरह नहीं होंगे, तो कारोबार भी पहले की तरह नहीं होगा। इस्टर्न रीजन ट्रैवेल एजेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया के चेयरमैन अनिल पंजाबी कोलकाता दुर्गा पूजा उत्सव का टूरिस्ट पोटेंशियल समझाते हैं। कहते हैं ‘दिस टाइम ऑफ टिल नाउ इट्स अ बिग जीरो’। कोरोना की मार ऐन मौके मार्च में पड़ी जब बच्चों के रिजल्ट आते हैं। पेरेंट्स बच्चों से प्रॉमिस करते हैं। होटल की बुकिंग शुरू हो जाती थी। पंजाबी इन दिनों लोगों को समझाने में जुटें हैं। इंस्टालमेंट तक में टूरिस्ट बुकिंग की बात करते हैं। कहते हैं मंत्रालय से लेकर इंडस्ट्री तक को समझा रहे हैं कि लुभावने ऑफर दें। लेकिन, पंजाबी यहीं रुक जाते हैं। इसमें उम्मीद और नाउम्मीदी दोनों हैं।

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